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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
सुललाटं सुकेशान्तं सुभ्र्वक्षिदशनच्छदम् |  ३३   क
अपश्यतस्तद्वदनं का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति