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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
सुकुमारः सदा वीरो महार्हशय़नोचितः |  ३७   क
भूमावनाथवच्छेते नूनं नाथवतां वरः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति