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अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
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भीष्म उवाच
वैश्यस्य वर्तमानस्य वैश्याय़ां भरतर्षभ |  ५२   क
शूद्राय़ां चैव कौन्तेय़ तय़ोर्विनिय़मः स्मृतः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति