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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
नूनं वैवस्वतश्च त्वा वरुणश्च प्रिय़ातिथिः |  ४३   क
शतक्रतुर्धनेशश्च प्राप्तमर्चन्त्यभीरुकम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति