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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
यो मां नित्यमदीनात्मा प्रत्युद्गम्याभिनन्दति |  ५१   क
उपय़ान्तं रिपून्हत्वा सोऽद्य मां किं न पश्यति ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति