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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
रणे विनिहतं श्रुत्वा शोकार्ता वै विनङ्क्ष्यति |  ५३   क
सुभद्रा वक्ष्यते किं मामभिमन्युमपश्यती |  ५३   ख
द्रौपदी चैव दुःखार्ते ते च वक्ष्यामि किं न्वहम् ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति