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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
वज्रसारमय़ं नूनं हृदय़ं यन्न यास्यति |  ५४   क
सहस्रधा वधूं दृष्ट्वा रुदतीं शोककर्शिताम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति