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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
आगमिष्यति वः क्षिप्रं फलं पापस्य कर्मणः |  ५८   क
अधर्मो हि कृतस्तीव्रः कथं स्यादफलश्चिरम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति