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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
अहो वः पौरुषं नास्ति न च वोऽस्ति पराक्रमः |  ७६   क
यत्राभिमन्युः समरे पश्यतां वो निपातितः ||  ७६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति