कर्ण पर्व  अध्याय ५०

सञ्जय़ उवाच

ततोऽव्रवीद्वासुदेवः प्रहसन्निव पाण्डवम् |  २   क
कथं नाम भवेदेतद्यदि त्वं पार्थ धर्मजम् |  २   ख
असिना तीक्ष्णधारेण हन्या धर्मे व्यवस्थितम् ||  २   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति