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कर्ण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ महावाहो मानितोऽस्मि दृढं त्वय़ा |  ३०   क
माहात्म्यं विजय़ं चैव भूय़ः प्राप्नुहि शाश्वतम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति