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कर्ण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
युक्तं तु रथमास्थाय़ दारुकेण महात्मना |  ४०   क
आपृच्छ्य धर्मराजानं व्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च |  ४०   ख
समङ्गलस्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम् ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति