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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युत्थाय़ तु ते सर्वे पूजय़ित्वा यतव्रतम् |  १९   क
देवर्षिं पर्यपृच्छन्त यथावृत्तं कुरून्प्रति ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति