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कर्ण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
प्रय़ातस्याथ पार्थस्य महान्स्वेदो व्यजाय़त |  ४७   क
चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं न्वेतद्भविष्यति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति