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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
अवधानेन सुभगे नित्योत्थानतय़ैव च |  ३७   क
भर्तारो वशगा मह्यं गुरुशुश्रूषणेन च ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति