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कर्ण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
देवैरपि हि संय़त्तैर्विभ्रद्भिर्मांसशोणितम् |  ६३   क
अशक्यः समरे जेतुं सर्वैरपि युय़ुत्सुभिः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति