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कर्ण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
दुरात्मानं पापमतिं नृशंसं; दुष्टप्रज्ञं पाण्डवेय़ेषु नित्यम् |  ६४   क
हीनस्वार्थं पाण्डवेय़ैर्विरोधे; हत्वा कर्णं धिष्ठितार्थो भवाद्य ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति