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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
विश्वे देवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः |  १७   क
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति