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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् |  १८   क
प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति