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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
मम प्रिय़करी चापि सततं प्रिय़दर्शने |  २०   क
तस्मात्सारस्वतः पुत्रो महांस्ते वरवर्णिनि ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति