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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
स देवैर्याचितोऽस्थीनि यत्नादृषिवरस्तदा |  २९   क
प्राणत्यागं कुरुष्वेति चकारैवाविचारय़न् |  २९   ख
स लोकानक्षय़ान्प्राप्तो देवप्रिय़करस्तदा ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति