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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्थिभिरथो शक्रः सम्प्रहृष्टमनास्तदा |  ३०   क
कारय़ामास दिव्यानि नानाप्रहरणान्युत |  ३०   ख
वज्राणि चक्राणि गदा गुरुदण्डांश्च पुष्कलान् ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति