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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
दिग्भ्यस्तान्प्रद्रुतान्दृष्ट्वा मुनिः सारस्वतस्तदा |  ३६   क
गमनाय़ मतिं चक्रे तं प्रोवाच सरस्वती ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति