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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
यो ह्यधर्मेण विव्रूय़ाद्गृह्णीय़ाद्वाप्यधर्मतः |  ४६   क
म्रिय़तां तावुभौ क्षिप्रं स्यातां वा वैरिणावुभौ ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति