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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
आसीत्पूर्वं महाराज मुनिर्धीमान्महातपाः |  ५   क
दधीच इति विख्यातो व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति