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आदि पर्व
अध्याय ५१
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ऋत्विज ऊचुः
नूनं मुक्तो वज्रभृता स नागो; भ्रष्टश्चाङ्कान्मन्त्रविस्रस्तकाय़ः |  १३   क
घूर्णन्नाकाशे नष्टसञ्ज्ञोऽभ्युपैति; तीव्रान्निःश्वासान्निःश्वसन्पन्नगेन्द्रः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति