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आदि पर्व
अध्याय ५१
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सदस्या ऊचुः
वालोऽपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञां; यश्चाविद्वान्यश्च विद्वान्यथावत् |  २   क
सर्वान्कामांस्त्वत्त एषोऽर्हतेऽद्य; यथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति