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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा |  ६२   क
न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छाय़ेव हैमनी ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति