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शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
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एकतद्वितत्रिता ऊचुः
एवं सुतपसा चैव हव्यकव्यैस्तथैव च |  ५३   क
देवोऽस्माभिर्न दृष्टः स कथं त्वं द्रष्टुमर्हसि |  ५३   ख
नाराय़णो महद्भूतं विश्वसृग्घव्यकव्यभुक् ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति