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शान्ति पर्व
अध्याय ५१
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वासुदेव उवाच
अमुं च लोकं त्वय़ि भीष्म याते; ज्ञानानि नङ्क्ष्यन्त्यखिलेन वीर |  १७   क
अतः स्म सर्वे त्वय़ि संनिकर्षं; समागता धर्मविवेचनाय़ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति