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शान्ति पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु |  ४   क
योगेश्वर नमस्तेऽस्तु त्वं हि सर्वपराय़णम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति