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अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
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नहुष उवाच
व्रवीतु भगवान्मूल्यं महर्षेः सदृशं भृगोः |  १८   क
परित्राय़स्व मामस्माद्विषय़ं च कुलं च मे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति