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अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
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च्यवन उवाच
उत्तिष्ठाम्येष राजेन्द्र सम्यक्क्रीतोऽस्मि तेऽनघ |  २६   क
गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किञ्चिदिहाच्युत ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति