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अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
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च्यवन उवाच
कृपणस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च |  ३८   क
नरं समूलं दहति कक्षमग्निरिव ज्वलन् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति