अनुशासन पर्व  अध्याय ५१

नहुष उवाच

करवाणि प्रिय़ं किं ते तन्मे व्याख्यातुमर्हसि |  ४   क
सर्वं कर्तास्मि भगवन्यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति