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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
नकुलं च चतुःषष्ट्या धृष्टद्युम्नं च पञ्चभिः |  १०   क
सप्तभिर्द्रौपदेय़ांश्च त्रिभिर्विव्याध सात्यकिम् |  १०   ख
धनुश्चिच्छेद भल्लेन सहदेवस्य मारिष ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति