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अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
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च्यवन उवाच
श्रमेण महता युक्ताः कैवर्ता मत्स्यजीविनः |  ५   क
मम मूल्यं प्रय़च्छैभ्यो मत्स्यानां विक्रय़ैः सह ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति