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शान्ति पर्व
अध्याय १७७
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भृगुरु उवाच
घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशय़ः |  १०   क
तेषां पुष्पफले व्यक्तिर्नित्यं समुपलभ्यते ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति