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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
रुचितं हि ममैतत्ते द्वारकागमनं प्रभो |  २३   क
अचिराच्चैव दृष्टा त्वं मातुलं मधुसूदन |  २३   ख
वलदेवं च दुर्धर्षं तथान्यान्वृष्णिपुङ्गवान् ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति