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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
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युधिष्ठिर उवाच
पुण्डरीकाक्ष भद्रं ते गच्छ त्वं मधुसूदन |  ४२   क
पुरीं द्वारवतीमद्य द्रष्टुं शूरसुतं प्रभुम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति