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शान्ति पर्व
अध्याय २५४
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भीष्म उवाच
नद्यां यथा चेह काष्ठमुह्यमानं यदृच्छय़ा |  २३   क
यदृच्छय़ैव काष्ठेन सन्धिं गच्छेत केनचित् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति