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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
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युधिष्ठिर उवाच
निवर्तय़ित्वा कुरुराष्ट्रवर्धनां; स्ततः स सर्वान्विदुरं च वीर्यवान् |  ५५   क
जनार्दनो दारुकमाह सत्वरः; प्रचोदय़ाश्वानिति सात्यकिस्तदा ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति