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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव |  ८   क
यथाहं त्वा विजानामि यथा चाहं भवन्मनाः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति