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सभा पर्व
अध्याय ५१
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धृतराष्ट्र उवाच
अनर्थमर्थं मन्यसे राजपुत्र; सङ्ग्रन्थनं कलहस्यातिघोरम् |  ११   क
तद्वै प्रवृत्तं तु यथा कथं चि; द्विमोक्षय़ेच्चाप्यसिसाय़कांश्च ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति