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सभा पर्व
अध्याय ५१
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धृतराष्ट्र उवाच
वाक्यं न मे रोचते यत्त्वय़ोक्तं; यत्ते प्रिय़ं तत्क्रिय़तां नरेन्द्र |  १४   क
पश्चात्तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक्यं; न हीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति