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सभा पर्व
अध्याय ५१
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धृतराष्ट्र उवाच
दृष्टं ह्येतद्विदुरेणैवमेव; सर्वं पूर्वं वुद्धिविद्यानुगेन |  १५   क
तदेवैतदवशस्याभ्युपैति; महद्भय़ं क्षत्रिय़वीजघाति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति