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सभा पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
सभेय़ं मे वहुरत्ना विचित्रा; शय़्यासनैरुपपन्ना महार्हैः |  २१   क
सा दृश्यतां भ्रातृभिः सार्धमेत्य; सुहृद्द्यूतं वर्ततामत्र चेति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति