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वन पर्व
अध्याय ५१
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वृहदश्व उवाच
एवमुक्तस्तु शक्रेण नारदः प्रत्यभाषत |  १८   क
शृणु मे भगवन्येन न दृश्यन्ते महीक्षितः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति