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वन पर्व
अध्याय ५१
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वृहदश्व उवाच
तां रत्नभूतां लोकस्य प्रार्थय़न्तो महीक्षितः |  २१   क
काङ्क्षन्ति स्म विशेषेण वलवृत्रनिषूदन ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति