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वन पर्व
अध्याय ५१
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वृहदश्व उवाच
ततस्तच्छुश्रुवुः सर्वे नारदस्य वचो महत् |  २३   क
श्रुत्वा चैवाव्रुवन्हृष्टा गच्छामो वय़मप्युत ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति